यह जमीन सिर्फ आदमी कि नही सब कि है?

 यह जमीन सिर्फ आदमी कि नही सब कि है?

 


           ०--- बाबूलाल दाहिया

             मित्रो ! यह कविता की पंक्ति श्री श्याम बहादुर नम्र जी की है। इस पंक्ति के आगे श्री नम्र  कहते है कि " कि अगर हिरण का हक जंगल मे छलांग लगाने का है तो वही हक सिंह को  दहाड़ते फिरने और चिड़ियों को उड़ने एवं चहचहाने का भी। 

      उधर नदियों को निर्बाध रूप से बहने का अगर अधिकार है तो पर्वतों के उतंग चोटियों को आकाश की ऊँचाई छूने का भी । 

       इसलिए आगे मनुष्य को वें यह सलाह  देते हुए कहते हैं कि,

आदमी को चाहिए कि सब के हक को जान ले।

सब के हक के साथ ही वो अपना हक भी मान ले।।

           पर ऐसा है नही ? ऐसा लगता है कि यह आदमी रूपी प्रकृति का विलक्षण प्राणी किसी को कुछ देने के बजाय सब के हकों को रौंद डालना चाहता है।

            7--8 साल पहले  जब मैंने अपने खेत मे फ्रेंसिंग करा दी तो देखा कि मेरे बिना लगाए ही पेड़ों की पचासों प्रजातियां अपने आप बाड़ में उग आईं ।

              किन्तु उनका बीज मेरे खेत मे कहा से आया होगा? क्यो कि तमाम बीजो वाले पेड़ खेत से काफी दूर हैं। निश्चय ही महुआ,लभेर, नीम , कोसम, कटाई एवं ऊमर के फल के बीजो को चिड़ियां लाई होगी।

      रेउजा खैर एवं बबूल के फल को खाकर उसका बीज बकरियाँ लाई होगी। उधर अर्जुन, कैथा बृक्ष का बीज यदि पानी मे बहकर आया होगा तो चिल्ला और मदार का बीज हवा द्वारा उड़करआया खेत तक पहुचा होगा। कुछ ऐसे सम्बाहको की भी भागीदारी होंगी जो अभी अपरिचित हैं।

      कहने का आशय यह कि कोई भी जंगली पौधा उगने के लिए मनुष्य का मोहताज नही है।वह मनुष्य से बस इतनी अपेक्षा अवश्य करता है  कि वह उससे दूरी बनाए रहे। क्योकि 80% जंगल तो चिड़िया और जंगली पशु विकसित करते है। मनुष्य का तो सदियों से उसे नष्ट करने का नाता ही रहा है।अगर मनुष्य लगाता भी है तो जंगल नही बल्कि कुछ ब्यावसायिक पौधे ही।

       लेकिन प्रश्न तो यह है कि जब 80% जंगली पशु पक्षी और हवा पानी ही जंगल को विकसित करते हैं तो अकेले मनुष्य का इस नैसर्गिक वन को मनमानी ढंग से उजाड़ कर उन पशु पक्षियों को सांसत में डालने का क्या अधिकार?मनुष्य के बनाए सारे कानून मनुष्य भर के हित मे होंगे य कुछ अन्य जन्तुओ के लिए भी?

           आज अगर बकस्वाहा के दो लाख से ऊपर पेड़ कट रहे है तो अकेले चिन्हित बड़े पेड़ भर नही कट रहे? उनके नीचे मझोले पेड़ होंगे, छोटे पेड़ होंगे, फिर झाड़ियां एवं गुल्म लताएं । जिनके नीचे अनेक प्रकार के कन्द और जड़ी बूटियां भी जो करोड़ो की संख्या में पहुँच जाय गे। 

      पर उनसे कितनी जैव विविधता की भोजन श्रंखला बाधित होगी? कितने जीव जन्तु अपने वंश परिवर्धन से बंचित रह जाए गे? वह अलग।

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