🌹*गुरु पूर्णिमा के महत्व पर विशेष*🌹

 🌹*गुरु पूर्णिमा के महत्व पर विशेष*🌹



हमारी प्राचीन परंपराओं में हमारे देश में बहुत सटीक समय का उपयोग एवं व्यवस्थाएं की जाती थी, इसके अंतर्गत उस काल में जब पक्के सड़क मार्ग, नदियों पर पुल आदि नहीं होते थे।

 तब इस चातुर्मास के समय में जो वर्षा काल होता है जिसमें कच्चे मार्ग कीचड़ भरे होने से और नदियों में बाढ़ का पानी आदि के कारण मनुष्यों का आवागमन अवरुद्ध हो जाता था।

 प्राकृतिक स्थिति को देखते हुए नगर के ग्राम के लोग उन गुरुकुल के गुरुओं को जो नगर से दूर शांत व एकांत स्थान जो विद्या अध्ययन के लिए उपयुक्त स्थान मानकर बनाए जाते थे। उसमें रहने वाले गुरु एवं शिष्य का पालन पोषण नगर से ही खाद्यन दूध यदि पहुंचा कर किया जाता था। 

जिसे गुरुकुल के विद्यार्थी स्वयं नगर में आकर भक्षांदेही कहकर गुरुकुल ले जाते थे, परंतु उन्हें भी आने जाने में मौसम के कारण परेशानी होती थी,

 इसके लिए एक व्यवस्था थी, कि इस पूर्णिमा के दिन गुरुकुल के छात्रों सहित गुरुओं को नगर में ही बुला लिया जाए एवं उनका सान्निध्य उनके द्वारा ज्ञान का प्रकाश पूरे नगर को प्राप्त हो।

 क्योंकि इस समय कृषि कार्य में भी कोई कार्य शेष नहीं रहता था, खेतों में बुवाई हो चुकी होती थी, फसल थोड़ी थोड़ी बढ़ जाती थी। खेतों में फसल ओर मेढों पर घास आदि बढ़ जाती है। *चूहे मनुष्य के दुश्मन होते है चाहे घर में हों या खेतों में नुकसान ही करते है।* ये बिलों में रहते है। नाग इन चूहों को खा जाता है इनके बिलों में ही रहने लगता है,

 पानी बिलों में भर जाने के कारण सर्प भी बाहर घूमने लगते है। 

 चूहे खेती को नुकसान पहुंचाते हैं और उन चूहों को सर्प खा कर खेती कि रक्षा करता था तो सर्पों को मरते नहीं थे।

पर *सांप कहीं मनुष्य के साथ कोई घटना दुर्घटना न कर दे इस कारण कृषक लोग नाग पंचमी पर्व मना कर खेतों में जाना ही बंद कर देते थे।* ताकि खेतों में नाग तो रहे पर हम वहां ना जाए और नाग अप्रत्यक्ष रूप से फसल की रक्षा करता रहे।

 परंतु मनुष्यों को कोई काम नहीं रहता था इस कारण *इस फुर्सत के समय को ज्ञान प्राप्ति में लगाने हेतु और गुरु और शिष्य की व्यवस्था सुनिश्चित करने हेतु गुरु पूर्णिमा के दिन गुरुकुल के उन गुरुओं को नगर में आमंत्रित किया जाता था।*

 आज के दिन *गुरूपुर्णीमा पर उनका नगर में स्वागत सत्कार किया जाता था।* इसके अलावा इनके मार्गदर्शन में इनके *ज्ञान को सुनने का कार्य प्रारंभ होता था। इसी कारण अगले महीने को श्रवण मास कहते हैं।* इसी के अंतर्गत जो नई पीढ़ी सुनने समझने लायक हो जाती थी उनका *यज्ञोपवीत श्रावणी पूर्णिमा के दिन कराया जाता था जिनके जनेऊ पहले से होते है वे नए बदलते है* इसके पश्चात एक के बाद एक विषयों पर धार्मिक ज्ञान चर्चा होती थी। किसी विषय को 10 दिन,

किसी विषय को 16 दिन (१६ श्राद्ध),

 *शक्ति के महत्व पर विषय को 9 दिन(नौ दुर्गा)*

 इस प्रकार निरंतर ज्ञान का प्रसार होता था।

जैसे *पूर्वजों से संबंधित ज्ञान 16 दिन के अंतर्गत पूर्ण कर लिया जाते थे।*

 *शक्ति से संबंधित ज्ञान 8 दिन तक अलग-अलग शक्तियों का वर्णन करके नौवें दिन संगठन शक्ति दुर्गा नवमी के दिन समझा कर, इस संगठित दुर्गा शक्ति से क्या प्राप्त होता है इसका वर्णन विजयादशमी को किया जाता था।*

 इसके बाद *विजय से जो धन ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है, उसके रखरखाव और उपयोग का ज्ञान अगले दिनों में देते हुए धन से नर्क भी प्राप्त हो सकता है इसका उल्लेख नर्क चौदस को किया जाता था*

 एवं जो *शुभ मार्ग से धन आता है उसे लक्ष्मी कहते हैं* और इसकी रक्षा करना अत्यंत आवश्यक है, इसीलिए *वर्ष की सबसे घनी काली अंधियारी अमावस्या की रात्रि को लक्ष्मी के रखरखाव उसकी सुरक्षा को सूनिश्चित करने का ज्ञान सबसे अंधियारी काली रात में खूब प्रकाश करके प्रकाश पर्व बना कर दिया जाता था।* जिसे दीपावली कहते हैं।

 इसके बाद मौसम परिवर्तित हो चुका होता था, *नई फसलों में से कुछ खाने योग्य चीजें प्राप्त हो जाती थी उनको नवान्नेस्टी यज्ञ करवा कर  उनका उपयोग करना प्रारम्भ करते थे। ग्यारस के दिन जिसे आजकल देवउठनी ग्यारस कहते हैं।* 

उस दिन *ईश्वर सोकर नहीं उठते बल्कि गुरु पूर्णिमा के दिन जो देव स्वरूप गुरु आते थे वे उठकर अपने आश्रम में वापस चले जाते थे। इसलिए उन्हें देवों को उठने का दिन देवउठनी कहते हैं।*

 *परमात्मा ना सोता है ना जागता है*।

 और परमात्मा का सही *ज्ञान कराने वाला गुरु भी गुरुदेव ही कह लाता है*

 यही देव देवउठनी ग्यारस को उठकर अपने आश्रम को जाते थे।

 और *नगरवासी शादी विवाह अन्य प्रकार के कार्य या खेती को संभालना आदि कामों में लग जाते थे।* इस प्रकार चातुर्मास का समापन उस दिन हो जाता था जो *आज गुरु पूर्णिमा के दिन से प्रारंभ होता था* हमें अपनी पुरानी व्यवस्थाओं की जानकारी हो उसके अनुसार वर्तमान में भी हम *इस श्रवण मास को वेद प्रचार या ज्ञान के प्रचार प्रसार में लगाएं ज्ञान बांटे, ज्ञान प्राप्त करें हम सब इस को अपनाएंगे और अपनी परंपराओं से लाभ उठाएंगे* ऐसी शुभकामनाओं के साथ ॐ स्वस्ति।

आर्य पी एस यादव

प्रधान आर्य समाज मण्डी दीप

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