परम्परा गत देसी धान

 परम्परा गत देसी धान

   ०-- बाबूलाल दाहिया

 (आदरणीय दहिया जी राष्ट्रपति द्वारा पद्मभूषण से विभूषित हैं फेसबुक पर भी आप इनके ज्ञान अनुभव का लाभ ले सकते हैं।)

       हमारा मध्य प्रदेश देश का ह्र्दय स्थल है जिसकी सीमा उतर प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र , बिहार ,आदि कई राज्यो से मिली है। छत्तीश गढ़ तो अभी कुछ वर्ष पहले ही मध्य प्रदेश से अलग हुआ है किन्तु जिस प्रकार इस की सीमा अलग अलग राज्यो से मिलती है उसी प्रकार यहां का खान पान भी अलग अलग है। 

            पश्चिमोत्तर के खान पान में जहाँ ज्वार ,बाजरा मक्का और गेहू की प्रधानता है वही दक्षिण पूर्वी भाग में कुटकी , कोदो ,धान ,मक्का आदि की भोजन में बाहुलता है। 

            पर चावल ऐसा अनाज है जो अकेले भोजन की 40 % आपूर्ती करता है और  प्रायः हर जगह खाया जाता है।  

              इसकी खेती भी समुद्र के किनारे से लेकर  ऊंचे पहाड़ो तक में की जाती है।

            कौनसा  अनाज कहा से लाकर यहां उगाया जाने लगा ? यह जान पाना तो कठिन है । किन्तु देसी धान को  बड़े विश्वास के साथ कहा जा सकता है कि यह यही का अनाज होगा ? और  अगर बाहर से भी आया होगा तो कई हजारो बर्ष पहले  जिसके दो तीन कारण है।

      1--इसकी जंगली प्रजाति पसही आज भी डबरों पोखरों में नैसर्गिक ढंग से यहां उगती है।

      2--यह यहां के जलवायु में रची बसी है और ऋतु से संचालित होने के कारण आगे पीछे की बोई साथ साथ पक जाती है।

       3-- जब 20 --25 सितंबर के आस पास वर्षा समाप्त हो जाती है तो देसी धान ओस में पक आती है।

       4--रोग ब्याधियो से जूझने की इसमें अद्भुत क्षमता है।

                       1965 तक हमारे देश में धान की 1लाख 10 हजार प्रजातियां थी पर दो चार बाहरी बौनी किस्मो के आजाने से  एक लाख प्रजाति तो पूरी तरह समाप्त हो चुकी है। जो भी शेष है तो 10 हजार के भीतर ही शेष बची है।

         पर जिस गति से धान की परम्परागत किस्मे बिलुप्त हो रही है , यह चिंता का बिषय है। 

                अकेले अविभाजित मध्य प्रदेश में ही 70 के दशक में जाने माने कृषि बैज्ञानिक डा. राधेलाल रिछारिया जी ने 22800 प्रजातियां चिन्हित किया था ।

       पर अब यदि दोनों राज्यो की खोज में 800 भी मिल जाय तो बहुत अधिक है। 

           कोई भी धान प्रथम वर्ष 80 - 85 प्रतिसत जमती है ।  दूसरे वर्ष 20 -25 %और तीसरे वर्ष बिलकुल नही जमती। 

      अस्तु सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि पिछले 8 -10 हजार वर्षो से यह देसी धान कितनी बड़ी प्रतिष्पर्धा झेल कर जीवित रही होगी ? जो बौनी किस्मो के आने से 50 साल में ही निपट गई ।

            बात सिर्फ देसी धान के खत्म होने की नही है। उसके साथ उसके वे सारे गुण धर्म भी  चले जाते है जो हजारो साल से उसने यहां की परिस्थितिकी व जलवायु में रच बस कर अपने गुण सूत्रों में विकसित किया था। 

       साथ ही वह मुहाबरे लोकोक्तियां कहावते और लोक कथाएं भी तो खत्म हो जायगी जो उस के गुण धर्मो के आधार पर  अनाम ब्यक्तियों द्वारा रची गई थी ?

     इसलिए अकेले धान ही नही वे सभी देसी अनाज बचाने की जरूरत है जो हजारो साल से यहां की परम्परा में थे।

 प्रस्तुत चित्र में मूठ में बंधी हुई 100 से अधिक देसी धान की बालिया दिख रही है।

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