ज्वार जिसे प्रकृति ने ठंड में खाने के लिए बनाया,इसकी तासीर गर्म है।

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 तोर खाव चउस्याला ज्वन्हरी,तोही जपौ जइसै माला

              ०--बाबूलाल दाहिया

                           यू तो यह बघेल खण्ड में गाये जाने वाले एक लोकगीत की पंक्ति है। किन्तु प्राचीन समय में किसानों के घरों में ज्वार का यही महत्व था। 

          ज्वार अमूमन दशहरा से दीपावली के बीच निपस कर तैयार होने वाला अनाज है जिसे प्रकृति ने ठंड के दिनों में खाने के लिए बनाया ही था।

               यह दीपावली से होली यानी कि कार्तिक से फागुन तक खाई जाती थी। इसके पीछे एक लॉजिक यह था कि ताशीर गर्म होने के कारण इसे खाने से ठंड ऋतु में शीत जनित बीमारी शर्दी - जुखाम, निमोनिया आदि नही होती थी। 

            इसकी रोटी, दलिया तो प्रायः खाई ही जाती थी पर चउस्याला का स्थान एक व्यंजन जैसा था जिसमे, धनिया, जीरा ,नमक ,मिर्च आदि डाल कर बनाया जाता था। इसके अतिरिक्त भी फूटा ,लाबा, कोहड़ी और महुए के भुरकुन्ने के साथ भी भुनी हुई ज्वार मिलाई जाती थी।

किन्तु उसके तिली मिले हुए ताजे भुट्टे के गादा का तो स्वाद ही निराला होता था।

       रियासती जमाने में दसहरा से दीपावली तक की जो 28 दिन की स्कूल की फसली छुट्टी का प्रावधान था वह महज इसीलिए था कि बच्चे आपने घर की खेती में सहयोग कर सके। किन्तु उसमे बच्चे लोगो के जिम्मे का मुख्य काम ज्वार की तकाई का ही होता था।

        हर ज्वार के खेत में एक मड़ेचा"मचान"

होता जिसमे चढ़ कर बच्चे गोफने में मिट्टी की  डली रख पक्षियो को उड़ाते रहते।

        ज्वार की अलग अलग उद्देश्य से अलग अलग किस्मो को बोया जाता था। वे उद्देश्य थे गादा, रोटी, दलिया और फूटा। 

       गादा के लिए मुख्यतः चरकी, अरहरा, वैदरा  आदि अच्छे माने जाते थे तो रोटी के लिए चरकी  और लाबा भूनने के लिए झलरी ज्वार। पर घाठ  " दलिया " हर एक किस्म की ज्वार की खाई जाती थी।

     उधर उसकी कर्बी पशुओं के लिए अगहन से माघ तक के लिए हरे चारे का काम करती थी। किन्तु आज यह सब बीते जमाने की चीज है जिसकी अनुभूति मात्र शेष है।

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